क्रांति
जिन्दगी के पथ पर
जो मुह लटकाए बैठे थे
चल पड़े हैं वो आज
जो सर झुकाए बैठे थे
मृत्यु-भय से अस्पन्दित
जो पीठ टिकाये बैठे थे
चल पड़े हैं वो आज
जो राग मिलाये बैठे थे
अपशब्दों का पान कर
जो आस लगाए बैठे थे
चल पड़े हैं वो आज
जो टाक लगाए बैठे थे
बजा शंख, कृपाण उठा
जो कफ़न बिछाए बैठे थे
निकल पड़े हैं वो आज
जो सीने में आग जलाए बैठे थे
–Shivam Prasad
Photograph Credits: Nirmit kapoor

Abhay Shukla
Kudos to Shivam Prasad for writing this brilliant piece of poem.